Copper Price Hike: सोने चांदी के बाद ताम्बे ने भी अपना जलवा दिखा दिया है। ताम्बे की कीमत सोने से भी तेज बढ़ रही है। दुनियाभर के कमोडिटी मार्केट में सप्लाई की किल्लत और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच कॉपर (तांबा) की कीमतों ने इतिहास रच दिया है। लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर फ्यूचर्स में 4.3% की जबरदस्त तेजी देखी गई, जिससे इसकी कीमत पहली बार 13,000 डॉलर प्रति टन के ऐतिहासिक आंकड़े को छू गई। ट्रेडर्स के बीच इस समय अफरा-तफरी का माहौल है, क्योंकि अमेरिका द्वारा संभावित टैरिफ लगाने के डर से शिपमेंट का रुख तेजी से अमेरिका की ओर मुड़ गया है, जिसके कारण दुनिया के अन्य हिस्सों में तांबे की भारी कमी हो गई है।
पहली बार $13,000 के पार पहुंचा तांबा
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तांबे की कीमतों में आए इस तूफान ने निवेशकों को हैरान कर दिया है। बेंचमार्क कॉपर फ्यूचर्स में आई इस उछाल की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी व्यापार नीतियों को माना जा रहा है। ट्रेडर्स ने टैरिफ से बचने के लिए अपनी इन्वेंट्री को पहले ही अमेरिका भेजना शुरू कर दिया है। इस “आर्बिट्राज ट्रेड” (बाजार के अंतर से लाभ कमाने की प्रक्रिया) की वजह से ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हुई है और एशिया व यूरोप जैसे बाजारों में तांबे की उपलब्धता अचानक घट गई है, जिससे कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।
चिली में हड़ताल और वेनेजुएला संकट का असर
सप्लाई के मोर्चे पर मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। दुनिया के सबसे बड़े कॉपर उत्पादक देश चिली की ‘मैन्टोवर्डे माइन’ (Mantoverde mine) में मजदूरों की हड़ताल शुरू होने से उत्पादन ठप पड़ने की आशंका गहरा गई है। इसके साथ ही, अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के खिलाफ की गई हालिया कार्रवाई ने भी बाजार में तनाव पैदा कर दिया है। निवेशक अब इस बात का आकलन कर रहे हैं कि इन राजनीतिक गतिविधियों का प्राकृतिक संसाधनों की सप्लाई पर क्या असर पड़ेगा, जिससे बेस मेटल्स के बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।
क्लीन एनर्जी की मांग ने दी रफ़्तार
कॉपर को भविष्य की “ग्रीन मेटल” कहा जाता है, क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और एनर्जी ट्रांजिशन के प्रोजेक्ट्स में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। साल 2025 में कॉपर की कीमतों में 42% की रिकॉर्ड बढ़त दर्ज की गई, जो 2009 के बाद इसका सबसे अच्छा प्रदर्शन है। 2026 में भी यह रुझान जारी रहने की उम्मीद है, क्योंकि विकसित देश अपनी एनर्जी जरूरतों को क्लीन एनर्जी की तरफ मोड रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे दुनिया कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में बढ़ेगी, तांबे की मांग और भी तेजी से बढ़ेगी।
इन्वेंट्री का असंतुलन और विशेषज्ञों की राय
UBS ग्रुप के विश्लेषकों के अनुसार, दुनिया की कुल कॉपर इन्वेंट्री का लगभग आधा हिस्सा इस समय अमेरिका के पास जमा है, जबकि वहां की खपत वैश्विक मांग की तुलना में 10% से भी कम है। इस क्षेत्रीय असंतुलन की वजह से वैश्विक रिफाइंड कॉपर बाजार में कृत्रिम कमी (Artificial Shortage) पैदा हो गई है। LME में ‘बैकवर्डेशन’ (शॉर्ट टर्म में ज्यादा कीमत) की स्थिति यह संकेत दे रही है कि आने वाले कुछ महीनों में तांबे की तंगी और भी ज्यादा बढ़ सकती है, जो ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए चिंता का विषय है।
2026 में और गहरा सकता है संकट
चीन सिक्योरिटीज के विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2026 में वैश्विक कॉपर मार्केट में 1 लाख टन से अधिक की कमी देखी जा सकती है। सप्लाई में गिरावट और अमेरिकी टैरिफ से पैदा हुई अनिश्चितता इस साल भी कीमतों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखेगी। सोमवार दोपहर को जब LME पर तीन महीने का कॉपर 12,995 डॉलर प्रति टन पर ट्रेड कर रहा था, तब यह साफ हो गया कि आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, बिजली के तारों और ऑटोमोबाइल सेक्टर में लागत बढ़ने वाली है।