Luxury Cars in Second Hand Market: सड़क किनारे या ऑनलाइन विज्ञापनों में जब आप BMW, Audi या Mercedes जैसी लग्जरी कारों को 5 से 10 लाख रुपये में देखते हैं, तो मन में पहला सवाल यही आता है— “इतनी सस्ती कैसे?” सोशल मीडिया पर ऐसी कारों की रील्स की बाढ़ आई हुई है। लेकिन जिसे आप अपनी ‘किस्मत’ समझ रहे हैं, वह दरअसल एक बहुत बड़ा और खतरनाक खेल हो सकता है। करोड़ों की कारें कौड़ियों के दाम पर मिलने के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि “टोटल लॉस” (Total Loss) का एक ऐसा सिस्टम है, जिसे समझना आपके लिए बहुत जरूरी है।
The Concept of IDV
हर कार का एक बीमा होता है और उस बीमे की एक IDV (Insured Declared Value) तय की जाती है। आसान भाषा में कहें तो यह वह रकम है जो बीमा कंपनी कार के पूरी तरह बर्बाद होने या चोरी होने पर आपको देती है। हर साल कार की पुरानी होने के साथ यह वैल्यू घटती जाती है। जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, तो बीमा कंपनी इसी वैल्यू के आधार पर फैसला लेती है कि गाड़ी ठीक होगी या उसे ‘कबाड़’ घोषित करना है।
Luxury Accidents
लग्जरी कारों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनके पार्ट्स और मरम्मत का खर्च बहुत ज्यादा होता है। मान लीजिए किसी BMW का बड़ा एक्सीडेंट हुआ और वर्कशॉप ने मरम्मत का बिल 25 लाख रुपये थमा दिया। अगर उस कार की IDV 30 लाख रुपये है, तो बीमा कंपनी उसे ठीक कराने के बजाय “टोटल लॉस” घोषित करना बेहतर समझती है। कंपनी मालिक को पूरे पैसे दे देती है और कार अपने कब्जे में ले लेती है। यहीं से शुरू होता है उन कारों का “पुनर्जन्म”।
The Secret Resale of Total Loss Vehicles
ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि टोटल लॉस कार सीधे कबाड़खाने (Scrap) में जाती है, लेकिन ऐसा नहीं है। बीमा कंपनियां इन क्षतिग्रस्त कारों को नीलामी के जरिए खास वेंडर्स या डीलरों को बेच देती हैं। ये वेंडर ऐसी कारों को उनकी IDV की आधी कीमत पर खरीद लेते हैं। उदाहरण के लिए, 30 लाख की IDV वाली एक्सीडेंटल कार उन्हें 15-18 लाख रुपये में मिल जाती है।
From Junk to Glossy Showroom Look
ये वेंडर्स उन कारों को फिर से “नया” बनाने का काम शुरू करते हैं। इसमें ऑथराइज्ड पार्ट्स के बजाय जुगाड़, पुराने पार्ट्स, या सस्ते इम्पोर्टेड पुर्जों का इस्तेमाल किया जाता है। जिसे बड़ी वर्कशॉप ने “ठीक न होने लायक” कहा था, उसे ये वेंडर्स बाहर से चमकाकर सड़क पर दौड़ने लायक बना देते हैं। पेंट और पॉलिश के बाद यह पहचानना नामुमकिन हो जाता है कि इस कार का कभी भयानक एक्सीडेंट हुआ था।
Used Car Market Entry and High Risks
पूरी तरह तैयार होने के बाद यह कार सेकंड हैंड मार्केट में आती है। जो कार कभी 80 लाख की थी, वह वेंडर से डीलर और फिर डीलर से ग्राहक तक पहुँचते-पहुँचते 25-30 लाख (या पुराने मॉडल के मामले में 5-10 लाख) में बिकने के लिए तैयार होती है। खरीदार को कभी बताया ही नहीं जाता कि यह कार कभी “टोटल लॉस” घोषित हो चुकी थी। कागजों के हेर-फेर और शहर बदलने की वजह से कार की हिस्ट्री छिपा ली जाती है। ऐसी कारें न केवल असुरक्षित होती हैं, बल्कि इनका दोबारा बीमा कराना या इन्हें री-सेल करना भी लगभग नामुमकिन हो जाता है।